नोट:

कृपया हर लेख के साथ संलग्न दिलचस्प एनीमेशन भी देखें

सफेद क्रांति का काला परिणाम ।


संक्षिप्त वर्णन:
यह लेख हमारे समाज पर हुए 'सफ़ेद क्रांति' के नकारात्मक प्रभावों पर प्रकाश डालने जा रहा है। हम यहाँ दर्शकों को बता दें कि सफ़ेद क्रांति से भाव दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारों की और से किये प्रयत्न याँ फिर इसको 'श्वेत क्रांति' याँ 'ऑपरेशन फ्लड' भी कहा जाता है।  

* हम यहां विदेशी नस्ल के दुधारू मवेशियों को भारत आयात करने की पूरी कहानी और उनके साथ देशी गायों की क्रॉस-ब्रीडिंग पर चर्चा करेंगे।

* रासायन आधारित इंजेक्शनों, वेटेरनरी दवाओं, महँगे मवेशी-चारों आदि का भारत में प्रचलन और उनका मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव। 

* इंजेक्शन और दवाओं के जरिये अप्राकृतिक तरीके से दूध की पैदावार। 

* मवेशियों के प्रजनन के अप्राकृतिक तरीकों का प्रचलन। 

* भारत में दूध का व्यापारीकरण, विशाल डेयरी-फार्म और डेयरी-मार्किट का गठन। 

* भारत में दूध और दूध-मार्किट का वर्तमान परिदृश्य। 

* 'आवारा मवेशी' ( राजमार्गों पर और शहरों में आवारा मवेशी- 'श्वेत-क्रांति' का एक दुष्प्रभाव)। 

* 'सफ़ेद क्रांति' पर एक लघु एनिमेटेड फिल्म।

विस्तृत चर्चा: 

सफ़ेद क्रांति पहली बार 1963 में शाह मोहम्मद रजा पहलवी द्वारा ईरान में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य देश में दूध उत्पादन को अधिकतम करना और इस प्रकार दूध और दूध उत्पादों से आय उत्पन्न करना था। सफ़ेद क्रांति 1970 में भारत दाखिल हुई। 

भारत, जहाँ कभी 'दूध की नदियाँ' बहती थीं, ब्रिटिश साम्राज्य की सदियों पुरानी गुलामी के कारण दूध की कमी से जूझ रहा था। हालाँकि 1947 तक भारत ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी से मुक्त हो चुका था, लेकिन सदियों पुरानी गुलामी के बाद, वापिस उठने के लिए राष्ट्र संघर्ष कर रहा था। इसलिए वित्तीय संकट को दूर करने के लिए और 1961 में हरि क्रांति के तथाकथित सफल कार्यान्वयन के बाद, भारत में सफ़ेद क्रांति की भी शुरुआत की गई। 

भारत एक ऐसा देश था जहाँ हर जीव का सम्मान करना यहाँ की संस्कृति का एक अभिन्न अंग था, यहाँ तक कि पेड़-पौधों का भी यहाँ सम्मान किया जाता था। गायों की यहाँ बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा की जाती थी। न केवल दूध देने वाली गायें, बल्कि जो दूध नहीं भी देतीं थी उनकी भी यहाँ पूजा हुआ करती थी। लेकिन सफ़ेद क्रांति का लोगों की इन धार्मिक भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि केवल दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए पुरजोर ढंग से काम करना था। 

सफ़ेद क्रांति के लागू करने के दौरान यह पाया गया कि स्वदेशी गायों के साथ एक कमी यह थी कि, उनकी दूध उत्पादन क्षमता बहुत अधिक नहीं थी और साथ ही उनके दूध देने की अवधि भी कम थी। इसलिए सफ़ेद क्रांति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उस समय एक बहुत बड़ा और राष्ट्र-विरोधी कदम उठाया गया, जो 'मवेशियों की विदेशी उच्च दूध देने वाली नस्लों को भारत आयात करना था'। प्रमुख नस्लें जो उस समय भारत आयात की गईं :

1. ब्रिटेन से जर्सी


जर्सी गाय

2. हॉलैंड से होलस्टीन फ्रेशियन (एच.एफ.)


एचएफ गाय

3. अमेरिका से ब्राउन स्विस ।


                  भूरे रंग की गाय


ये मवेशी 60 से 70 लीटर प्रति दिन तक की बड़ी मात्रा में दूध उत्पादन करने के लिए प्रसिद्ध थे। इसलिए इन्हें भरत में बड़े पैमाने पर आयात किया गया। चूंकि सरकार सफ़ेद क्रांति का समर्थन कर रही थी, इसलिए इन मवेशियों को पूरे देश में व्यापक रूप से वितरित किया गया था। इन विदेशी मेहमानों के साथ काम करने के लिए इच्छुक डेयरी किसानों को भारी मात्रा में सब्सिडी और अन्य सुविधाएं भी प्रदान की गईं। श्वेत क्रांति के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश भर में डेयरी फार्म शुरू किए गए।अमूल को सफ़ेद क्रांति के दृष्टिकोण से ही  स्थापित किया गया था और यह श्वेत क्रांति का महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा खिलाड़ी था, सफ़ेद क्रांति जिसे 'ऑपरेशन फ्लड' के नाम से भी जाना जाता है।
उस समय दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की लालसा इतनी प्रबल थी कि देशी गायों की दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए इन देशी गायों को विदेशी नस्लों की गायों के साथ क्रॉसब्रीड किया गया, जिसका मतलब की दोनों भिन्न प्रजातियों का आपस में प्रजनन करवाया गया। इन सबके परिणाम बहुत ही घिनौने थे ।
क्रॉस की हुई गाय
हरियाणा नस्ल की गाय के साथ एच.एफ गाय की क्रॉस-ब्रीड का परिणाम  

'करण-स्विस' क्रॉसब्रीडिंग का एक उदाहरण है। राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल (हरियाणा) में, साहिवाल और ब्राउन स्विस  नस्लों को आपस में क्रॉस-ब्रीड करके एक नई नस्ल 'करण-स्विस' तैयार की गयी।

इन प्रकृति-विपरीत कदमों का परिणाम बहुत ही अप्रत्याशित और प्रतिकूल रहा। आयात की गयी नस्लें भारत की जलवायु के साथ मेल में नहीं आ पा रहीं थीं, इन्हें ठंडे देशों से आयात किया गया था। इसलिए उनके साथ काम करने के लिए उपयुक्त जलवायु परिस्थितियों की आवश्यकता थी, इसलिए पंखे और एयर-कंडीशनर उनके लिए आवश्यक थे और साथ ही उच्च गुणवत्ता वाली पशु चिकित्सा दवाओं और उच्च-ग्रेड की फ़ीड की भी आवश्यकता थी, इसलिए ये सब भी आयात किया गया। असल में ये दूध देने वाली मशीनें मात्र थीं, न तो इन्हें पशु ही माना जाता था और न ही इन्हें जीवित प्राणी ही समझा जाता था। इनसे इंजेक्शनों और दवाओं की मदद से दूध दुहा जाता था और प्रजनन भी इंजेक्शनों के जरिये ही किया जाता था। इन मवेशियों के रख-रखाव के लिए पूरी तरह से अप्राकृतिक और अमानवीय तरीके इस्तेमाल किए जाते थे। इस प्रकार पैदा किया गया दूध भी अप्राकृतिक और रोग पैदा करने वाले सूक्ष्म जीवों से भरपूर था। दूध पर हुए गहन अध्ययनों में यह पाया गया कि दूध के दो प्रकार हैं :
ए 1 और ए 2 दूध (A1 and A2 milk)
(आगे आने वाले लेख में दूध की इन श्रेणियों के बारे में और जानकारी प्राप्त करें।)

इन विदेशी मवेशियों का दूध A1 दूध की श्रेणी में आता है, जो मानव उपभोग के लिए अस्वास्थ्यकर है और उच्च कोलेस्ट्रॉल के स्तर और दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ाता है। 

क्रॉसब्रीडिंग का स्वदेशी गायों पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है जो की इन गायों की नस्लों को विलुप्त होने की सीमा तक ले आया है। जब मैं पंजाब, हरियाणा यां दिल्ली राज्य के इलाको में घूमता हूं, तो ज्यादातर गायें जो अब दिखाई देतीं हैं वह हैं -एच.एफ, जर्सी, क्रॉस-ब्रीड हुई यां दोगली गायें। शुद्ध देसी गायें आसपास के अधिकांश गाँवों से विलुप्त हो चुकीं हैं, जो खेद की बात है।
आप बहुत खुशकिस्मत होंगे यदि आज आपको देश के उत्तरी क्षेत्र के किसी भी घर में एक शुद्ध देशी गाय देखने को मिल जाती है तो, सफ़ेद क्रांति का प्रभाव इतना व्यापक और दुखद है।


सफ़ेद क्रांति के साथ शुरू हुईं प्रवृतियों के कारण, आज भी स्वदेशी भैंस और क्रॉस-ब्रीड गायों से इंजेक्शन और दवाईयों की मदद से दूध लिया जाता है और उनका प्रजनन भी इंजेक्शन की मदद से ही किया जाता है। सरकार ने बहुत से पशु-चिकित्सालय खोल रखें हैं जिनके मुख्य कामों में इंजेक्शनों की मदद से पशुओं का प्रजनन करना और हर संभव प्रयास करके उनसे ज्यादा से ज्यादा दूध प्राप्त करना है। 

अब आप ही निश्चित करें की उस दूध को क्या नाम दें जो पशुओं की मिश्रित नस्लों से प्राप्त किया गया है? एक पूर्व की नस्ल और एक दुनिया के पश्चिमी भाग से लायी गयी नस्ल, दोनों का क्या मेल? दूध मानव जाति की मुख्य जरुरत है, और सरकार की सफ़ेद क्रांति जैसी अदूरदर्शी नीतियों ने दूध की गुणवत्ता और पवित्रता को बर्बाद कर दिया है, जो सचमुच शर्म की बात है। ज्यादातर लोग तो यह जानते तक नहीं कि जिस दूध पर वह इतना पैसा खर्च कर रहें हैं और जो दूध बड़े उत्साह के साथ अपने बच्चों को भी पीला रहे हैं, वह दूध नहीं बल्कि 'धीमा जहर' बन चुका है।
शुद्ध प्राकृतिक दूध तो आज के जमाने में अतीत की बात लगती है

भारत के वर्तमान दूध-बाजार की बात करें तो स्थिति बाद से बदतर है। डेयरी भारत का एक विशाल व्यापारिक-क्षेत्र है, सभी घिनौने और गैरकानूनी ढंग दूध और दूध के अन्य उत्पादों के साथ प्रयोग किये जातें हैं।पैकेट वाले दूध से लेकर खुले दूध तक, कोई भी आपको दूध की शुद्धता और प्राकृतिक होने के तथ्य को सुनिश्चित नहीं कर सकता। नकली दूध और दूध से बनी अन्य मिठाईयों को बनाने में बड़े स्तर पर बोरिक पाउडर, नकली यां सूखे दूध का पाउडर और यहां तक ​​कि डिटर्जेंट का उपयोग भी बिना किसी डर के, जमकर किया जाता है। ज्यादा मुनाफा प्राप्त करने की लालसा ने दूध-मार्किट को भी नहीं बख्शा। दूध एक बहुत ही संवेदनशील उत्पाद है, साधारण तापमान पर भी दूध 2 दिनों से ज्यादा नही रह सकता, फिर केवल ईश्वर या दूध कंपनियां ही जानती हैं कि वे 90 दिनों तक दूध को बचाए रखने के लिए कौन-कौन सी दवाओं और केमिकलों का उपयोग करते हैं? मेरी व्यक्तिगत राय में, मुझे यह दूध शुद्ध या प्राकृतिक नहीं लगता। लेकिन लोग हाथ बाँध कर भी मिलावटी और हानिकारक दूध और दूध से बने अन्य उत्पाद खरीदने के लिए बेबस हैं।

इसके अलावा श्वेत क्रांति के कारण, दूध देने में असमर्थ, बीमार और इस कारण आवारा छोड़ दिए गए मवेशियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। बड़े डेयरी फार्म यां छोटे किसान, जिन्होंने अपने मवेशियों को बेकार या दूध देने में असमर्थ पाया, उन्होंने इन पशुओं को छोड़ दिया। इस वजह से ये पशु शहरों और खेतों में आवारा घूमने के लिए मजबूर हो गए। यदि कोई इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता है कि सफ़ेद क्रांति ने देश में दूध के उत्पादन को बढ़ाया है, तो वह इस तथ्य से भी इनकार नहीं कर सकता कि सफ़ेद क्रांति ने देश भर में आवारा मवेशियों और कसाईघरों की संख्या में भी व्यापक वृद्धि की है। हम एक अन्य लेख में तथ्यों और आंकड़ों के साथ इस विषय पर चर्चा करेंगे। आगे बढ़ते हुए, सिर्फ दूध की मात्रा को बढ़ाने के लिए दूध की गुणवत्ता के साथ समझौता करना, प्रकृति-चक्र के साथ छेड़छाड़ करना,किसी राष्ट्र की धार्मिक भावनाओं को आहत करना और लोगों के बहुमूल्य जीवन के साथ खेलना सच में घोर अपराध है।

आइये अब 'सफ़ेद क्रांति' पर बनी एक लघु एनिमेटेड फिल्म देखें। कृपया यह सुनिश्चित करें की आपके कंप्यूटर यां मोबाइल की मीडिया वॉल्यूम पूरी है फिर वीडियो को चलाने के लिए उसके ऊपर क्लिक करें।   

                          




प्रस्तावित उपाय :

हालांकि स्थिति बेहद गंभीर है, लेकिन पूरी दृढ़ता और संकल्पबल के साथ उठाए गए कदम पूरे परिदृश्य को बदल सकते हैं। दूध की पवित्रता और शुद्धता को फिर से बहाल करने के लिए, कुछ बेहद उत्साही और परिश्रमी लोग अपनी पूरी ऊर्जा के साथ काम कर रहे हैं। हम भी एक समाज के रूप में इस कठिन समस्या से बाहर आने के लिए अपनी ओर से जितना हो सके उतना प्रयत्न कर सकते हैं।
उपायों के बारे में अधिक जानकारी के लिए निचे दिए लिंक पर जाएं :
https://beingwellwithme.blogspot.com/2019/11/proposed-countermeasures-to-ill-effects.html







टिप्पणियाँ

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